फ़िक्र

वो करे तो इश्क
हम करे तो हवस कहलाती है
जाने क्यूं जहां में इतनी
जा़तियां बन जाती है।

वो शादी का परचम लेकर
कहीं भी पहुंच जाते है
हम अकेले परिंदो को
आब तक नहीं पिलाते है।

सफेद कपड़ों में छिपाकर
काला बदन अपना
शरीफ बनकर शराफत का
ठप्पा वो लगाते है।

पाक साफ है रूह नहीं पता
पर इश्क रूहानी है मेरा
ख्यालों को भी उम्दा रखते है
फिर भी मवाली कहलाते है।

इरादा कर लिया हमने भी
क्यूं करे फिक्र जमाने की
शेर जब राह से गुजरते है
काब भौंकते मिमियते है।

– देव

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