राहों में घूरते है…

मेरी अठखेलियों को,
मेरी जवानी समझते है।
ये भूखे खूंखार दरींदे,
मुझे राहों में घूरते है।।

कितना ढकु, कितना दिखाऊं,
क्या पहनी, लोग क्यूं सोचते है।
फीता के नजरो का, को
मेरे कपड़ों को नापते है।।

ये भूखे खूंखार दरींदे,
मुझे राहों में घूरते है।।

मेरी अस्मत को जाने क्यूं,
अपनी जागीर समझते है।
मेरे शुक्रिया कहने को भी,
पास आने की परमिशन समझते है।।

मेरी अठखेलियों को,
मेरी जवानी समझते है।
ये भूखे खूंखार दरींदे,
मुझे राहों में घूरते है।।

देव

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