लिखता हूं, फिर मिटा देता हूं

लिखता हूं, फिर मिटा देता हूं,
लिखता हूं, फिर मिटा देता हूं,
चाह कर भी उसे,
विश नहीं कर सकता हूं,

कुछ द्वंद सा मचा है,
कुछ संकोच भी है,
कहीं मेरे लिखने का,
असर है, या नहीं है,

बस, खुद ही पढ़,
मिटा देता हूं,
चाह कर भी उसे,
विश नहीं कर सकता हूं,

वो दिखती भी है ऑनलाइन,
पर लिखती नहीं, कुछ
हां, जवाब जरूर आते है,
लेकिन कंजूसी से,

उन्हें पढ़ कर भी,
संतोष कहा मिलता है,
चाह कर भी उसे,
विश नहीं कर सकता हूं

पढ़ेगी, या स्क्रॉल करके,
आगे बढ जाएगी,
क्या उसे, मेरी भाषा भी,
समझ आएगी,
या उसके मेसेज के इंतजार में,
रात तू ही गुज़र जाएगी,

हद है, में उसे कॉल भी
नहीं कर सकता हूं,
चाह कर भी उसे,
विश नहीं कर सकता हूं

Leave a Reply