और पिता जब,हार कर भी जीतेगा

Above poetry is for Vikas sir, one of my best friend, local guardian, mentor, a scene I observed last night, when his doughter was trying to convince him for something, good for him

एक मीठी सी नोकझोक,
या यूं कहूं, पिता पर,
पुत्री का आक्रोश,
दिखा रहा था, अधिकार,
रूप था चाहे, प्रतिकार,
पर था पूरा सम्मान,

जानती थी, है वक़्त कड़ा,
पर समझा रही थी,
क्या है भला, क्या है बुरा,
पिता भी, मुस्कुरा कर,
सब सह रहे थे,
जैसे, शेर के संग,
शावक खेल रहे थे,

ले मंद मंद मुस्कान,
दे रहे थे ज्ञान,
किन्तु, पुत्री भी तो,
आखिर पुत्री है पिता की,
है उसे संज्ञान,

कहा ऐसा वार्तालाप,
देखने को मिलेगा,
पुत्री में जहा, पिता की,
जीत का जज्बा होगा,
और पिता जब,
हार कर भी जीतेगा।।

देव

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s