दरवाजे की दहलीज पर॥

दरवाजे की दहलीज पर,
रख कर कदम,
कुछ ठिठक सा वो गया,
जरा सहमा सा, कुछ
सोचने था वो लगा, क्या
इसी पल के लिए, मैं
बड़ा हुआ था, या
ये नियति है, कि ऐसा
होना ही है, कुछ समझ
नहीं आ रहा था, वो
कहां जा रहा था, छोड़ कर,
उन्हें, जिन्होंने उसे यहां
तक लाने में, अपना
सब कुछ लुटा दिया था,
वक्त जो अनमोल,
हुआ करता था उनके लिए,
उस पर सारा लुटा दिया,
और झूठे प्यार के लिए,
कितना छोड़े जा रहा था,

जाने क्या हो गया था, शायद
उसका ज़मीर कहीं खो गया था,
लेकिन, वक्त पर सम्हल भी गया था
तभी तो, वृद्धाश्रम की चौखट पर,
वो ठिठक गया था, मुड़ा
मुड़ कर फिर चला, लिए,
आंखो में आंसू, आंगन को,
पार कर, उन चमकती हुई,
आंखो के सवालों का,
जवाब देते हुए, नहीं,
मुझसे ना हो पायेगा, बड़ा
हाथ अपना, दे सहारा
मुस्कुराते से चेहरे से, थाम
हाथ उनका, वो चल पड़ा,
दरवाजे की ओर, ये सूर्यास्त नहीं,
ये है लालिमा वाली भोर।।

देव

15/10/2020, 11:52 pm

Leave a Reply