कहाँ है वो पल,

कहाँ है वो पल,
जो कभी उसके करीब,
होने का अहसास कराते थे,
वो रहते दूर थे,
मगर हर वक्त खुद को,
उनके करीब पाते थे।

कहाँ है वक्त,
लबों पर उनके,
मुस्कान रहती थीं,
उसकी हंसी को देख,
सुबह और शाम,
हसीन होती थीं।

कहाँ है वो महफिल,
उनके होने से,
जो रंगीन होती थीं,
देखकर उनको सुरूर,
जो चढ़ता था, शराब भी,
कहां वो नशा देती थीं।

चलो, फिर से उसी
वक्त में चलते है
कुछ पल ही सही,
वही पल फिर जीते है,
उन्हें देखकर, हुस्न का,
उसके नशा करते है।।

देव

19/11/2020, 10:00 pm

Leave a Reply