अक्सर मैं, मैं नहीं रहती

यूं ही नहीं, अक्सर
अपनी अंगुलियों से
खेलती हूंँ मै,
तुमसे मुलाक़ात के,
बचे पल, गिनती हूंँ मैं,
अक्सर, बेबात ही,
आंसू छलक जाते है मेरे,
तेरे रुमाल को,
लगा चेहरे से,
महसूस तुझे करती हूंँ मैं।
बंद कर पलकें,
अक्सर सो जाती हूंँ मैं,
तेरे संग, बिताए हंसी
लम्हों में खो जाती हुॅं मैं।
अक्सर मैं, मैं नहीं रहती,
तू हो जाती हूंँ मैं।।
देव
29/01/2021, 9:06 am

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