तुझे मिलेगी मंजिल फिर से नई…

लोग क्या कहेंगे
यही सोचती रही वो
अपने से ही, अकेले में बाते
अपनों से ही मुलाकाते
करने को मजबूर है वो,

अभी ही तो उसका साथ छोड़
वो कही चला गया था
उसे, अपने हाल पर अकेले
यही छोड़ गया था
और वो है, कि आगे बढ ही नहीं पाई
जिन्हे अपना कहते है, उन्हीं ने
पावों में, लोग क्या कहेंगे,
की बेडिया लगाई

लोगो का क्या है, कुछ भी
कहते रहते है
उन्हें क्या पता, जो तन्हा होते है
दर्द क्या सहते है
आगे बढ, दो कदम जब तू बढ़ाएगी
एक मांजिल ही तो छूटी है
और मिल जाएगी

वो भी तो अकेला ही है
जिसने तुझे कॉफी पर बुलाया था
लोगो क्या कहेंगे, इसीलिए
हाल ए दिल ना कह पाया था
समझ उसका भी दर्द, तुझसे
कुछ ज्यादा ही होगा
उस पर तो उसके है घरवालों का भी
विश्वास नहीं होगा
आदमी है वो, आसान नहीं उसका जीना भी
इसीलिए कदम तुझको उठाना होगा
मुश्किल नहीं है ये इतना भी

तू बड तो सही, ऐतबार कर तो सही
तुझे मिलेगी मंजिल फिर से नई

देव

ये भी इक इश्क़ था।

ये भी इक इश्क़ था।

पांच बजने का इंतजार करना
नोटबुक के पन्नों को बेसब्री से पलटना
कब खत्म होगी क्लास,
इशारों में दोस्तो को, बताना
चेहरे पे पचास एक्सप्रेशन बनाना
होठों से गालियों का बड़बड़ाना
क्लास खत्म होते ही,
अपने हिस्से का नाश्ता
दोस्त को थमा, अहसान जता
बस स्टॉप की ओर भागना

बस में खाली सीट को हथियाना
और कोई आए तो जताना,
“भाई, ये सीट रिजर्व्ड है, कहीं और बैठ जाओ”
फिर उसके इंतजार में खो जाना
और जब वो आए, खुदा से दुआ मांगना
“ऐ खुदा, आज तो उसे, मेरे बगल में बिठाना”

हां, वो दुआ खुदा ने भी सुनी
और जब वो पहली बार मिली
मेरी बगल कि सीट पर बैठी
मुस्कुरा कर उसको वेलकम किया
जैसे, सीट नहीं, घर हो अपना
होले से हैलो कहा,
उसने भी मुस्कुरा कर रेस्पॉन्स दिया
बस भाई, यह अपनी निकल ली
ये पहली सीढ़ी है जो पार कर ली
अब तो बस बातें शुरू
हर रोज होने लगे रूबरू
इक बात तो तय है
उस भी हमारी सोहबत मंजूर है
तभी तो, जब वो पहले आ जाती थी
बगल की सीट हमारे इंतजार में रोक ली जाती थी

सिलसिला, यू ही चलता रहा
उसके चेहरे का नूर, अच्छा लगने लगा
पर, अब तो बाय कहने का वक़्त पास था
उस भी पता था, की मैं मुसाफिर हूं
उस शहर में कुछ दिनों का मेहमान था
फिर, वहीं रास्ते वहीं तन्हाइयां होंगी
बहुत दूर रहेगी वो, बस यादें होंगी

आज भी, कभी कभी याद आ जाते है वो पल
जैसे, बरसो नहीं, मिला था उससे बस में बस कल
क्या ये हाल सिर्फ मेरा है है
या दुंडती है मुझे अब भी नज़रे उसकी किसी पल

देव

हां वो इश्क़ कहीं खो गया है…

आज की आप धापि
और जमाने के शोर में
जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

लब्जों में गड़ कर, हाल ए दिल
बड़े प्यार से, खत में भेजा करते थे
डाकिए से छीन, पड़ कर चिट्ठी,
यारो की तबियत का,जायजा लिया करते थे

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

बस, निकल आते थे, गलियों में उनकी
कि इक पल को, यार का दीदार हो जाए
कटी बॉल के दायरे में फसा कागज, फेक
शाम, 5 बजे, बगीचे में,
मिलने की जगह तय करते थे

वो उस बेंच पर बैठे, जमाने से नज़रे बचा
इशारों ही इशारों में बांते करती थी
और हम, जब तक वो थी, तकते थे
उसके जाने पर उसकी ही जगह बैठ ,
उसको महसूस किया करते थे

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

बड़ी खुशी हुए, जब अठारह का हुआ
पिताजी की बाइक, पर भी अधिकार हुआ
अब तो, कभी मोहल्ले से दूर, उससे मिलने जाता हूं
बाइक की पिछली सीट पर भी, उस बैठाता, घूमता हूं

बाइक पर भी एक मर्यादा होती थी
बस उसकी एक हथेली मेरे कंधे पर होती थी
बड़े ध्यान से, स्पीड ब्रेकर पार करता था
और गलती से कहीं और स्पर्श हो जाता
तो सॉरी बोलता था

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

तब प्यार सच्चा हुए करता था
इश्क़ में विश्वास हुआ करता था
उसको पाने कि जिद नहीं,
उस खुश देखना चाहता था


मिलने पर राजकुमार उस, खुद ही ने खुद को उसकी नज़रों से गिराया था
दबा ख्वाहिशों और गमो को अपने
उसकी शादी में, बारातियों को खाना खिलाया था
झलकते आंसुओ के सैलाब को रोक आंखो में
हस्ते चेहरे से, उसको विदा कर आया था

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

मेरी मां थी

Below is a truth… A very small part of struggle of my mom… For us…

जब भी मैं परेशा होता था
हरदम, मेरे बालो में उसका हाथ होता था
जब भी, मेरी तबियत नरम होती थी
वो वहीं आस पास होती थी

ऐसा नहीं, कि वो रहती थी हर वक़्त करीब
हमको दे सके एक सुंदर भविष्य
इसीलिए उसने अपना आराम छोड़ा
जो कभी, पली थी नाजो से
निकल पड़ी, अंगारो भारी रही पे
और अपना घर छोड़ा

आज भी याद है, जो डरती थी जरासी आहट से
सुनसान वीरान , अकेले से मकान में
रात के घनघोर अंधेरों में
एक छोटे से केरोसिन के दिए की रोशनी में
भरी गर्मी में, रात बिताती थी

रेगिस्तान के तपते धोरो के
इस ओर, उस ओर बसी बस्तियों में
तवे सी जलती सबको
और भभकती हवाओं में
पल्लू से चेहरे से को बांधे हुए
छोटी सी बोतल से बीच बीच में
कुछ घूंट पानी के पीते हुए
बच्चो को पोलियो की दवा पिलाने जाती थी
हमे अच्छी जिंदगी मिले
इसीलिए, नाराज से मौसमों में भी
अपना फ़र्ज़ निभाती थी
छह दिन इसी मशक्कत के बाद
इतवार को फिर, बड़े प्यार से
हमे खाना खिलाती, दुलारती थी
हां, वो कोई और नहीं
मेरी मां थी
मेरी मां थी

तू नहीं रहती वहां, पर तकता हूं आज भी…

मेरा आना जाना भी, उसी गली से था
जिस गली में, कभी तेरा घर था

देखा है मैंने कई बार, तुझे बाल सुखाते हुए
उलझी हुई सी जिंदगी को, संवारते हुए

तेरे लबों की मुस्कुराहट ने, कितनो को लुटा है
जाने, कितने दिलों का, दम वहा छूटा है

राहें बदल गई, फिर भी, गुजरता हूं आज भी
तू नहीं रहती वहां, पर तकता हूं आज भी

देव

लेफ्ट- राइट

लेफ्ट पे राइट
राइट पे लेफ्ट
करना सीख गई हूं
तेरे लेफ्ट राइट को ठीक करने में
अपना राइट लेफ्ट भूल गई हूं

वैसे, कार तो मैं भी उम्दा चलाती हूं
पर, बगल की सीट पर, जब तू होता है
हर सिग्नल तोड़ जाती हूं

और तेरे चेहरे की घबराहट पे
हसीं आती है
और पीछे बैठी वो, अपनी आंखो से
हाथ तक नहीं हटाती है

बस दुआ करती है, सही सलामत घर पहुंचा दो मुझे
मैं अपनी बेटी की, इकलौती मां कहलाती हूं

देव

ये इश्क़ नहीं तो क्या है

तेरी नज़रों का, उठना, उठ कर फिर गिरना
चेहरे पर गिरी जुल्फों का समेटना
कंपकपाते से होंठो से, दो लब्ज़ बोलना
चेहरे पर आती मुस्कान, को रोकना
पल्लू का, अंगुलियों में लपेटना
खोलना, और फिर लपेटना
कभी कभी, नज़रे बचाते हुए
आस पास टटोलना
माथे पर, हल्की सी शिकन
और कुछ पसीने की बूंदे
थोड़ा घबराते, थोड़ा शरमाते हुए
मुझको हैलो बोलना
मेरे बढ़ते हुए हाथो को तकना
तेरे हाथो का, हौले से हटना
फिर रुकना,
तू ही बता, ये इश्क़ नहीं तो क्या है

देव

क्या दमदार तेरी कहानी है


तुम नहीं, तो मैं, मैं नहीं
मेरी, हर ग़ज़ल, तेरी कहानी है
तू है, तो मेरे अल्फ़ाज़ है
तू नहीं, तो बेकार, जिंदगानी है

तू प्यार भी है, तू यार भी है
तू हर सुबह की मेरी, अंगड़ाई है
खुशनसीब हूं, मिले है यार मुझको
वरना, कौन कहता, देव, क्या बात,
क्या दमदार तेरी कहानी है

देव

औलाद मेरी, रहे खुश सदा…

मैं लाई हूं, सितारे जमी पर
तू यकीन तो कर, कुछ पल ही सही

तेरी जिंदगी, है मंजिल मेरी
मेरे परवरिश पर, तू ना शक कर जरा

जागी हूं राते, कि तू चैन से सो
तेरे ख्वाबों को, मंजिल अपनी बनाई

मानती हूं, तू बड़ा हो गया अब
तेरी मंजिले है, मुझसे जुदा

फिर भी दुआ, करती हूं खुदा से
औलाद मेरी, रहे खुश सदा

देव

बीता लो पल प्यार के, जो मिलते है अक्सर

मुसाफिर हूं, बस मंजिल की तलाश है
चला जा रहा हूं, जिंदगी की राहों पर

कभी मुड़ कर भी देख लेता हूं
छूटे है बहुत लोग, थे साथ जो कल तक

अफसोस नहीं, अभी और भी मिलेंगे
चलना है अभी, बहुत दूर तक

यही जिंदगी है, मिलना बिछड़ना
बीता लो पल प्यार के, जो मिलते है अक्सर

देव