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मैं आज, अपने गुजरे वक़्त को निखार रही हूं…

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उन छोटे होते हुए
कपड़ों को जरा सम्हाल रही हूं
मैं आज, अपने गुजरे वक़्त को
निखार रही हूं

चटक रंगो की कुर्ती
जो पहन, मिली थी तुझसे कभी
आज भी मेरी अलमारी की
शोभा बढ़ा रही है

दुपट्टा सरकने को तरसता सा,
तेरे हाथो के छूने के इंतजार में
आज भी, मेरे सुनहरे बालों को
छिपाने को, निकल जाता है

और आज भी, जब भी अपने
पुराने कपड़े सम्हालने बैठती हूं
तेरी यादों का जिक्र, जेहन से
बाहर आ ही जाता है

देव

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