नई दास्तां लिखूं

बारिशे तब गिरती है
जब सुकून नहीं होता
भीगे हुए दिलो पे घाव करती है
दर्द लेकर दुआ देने वालो
कुछ वक़्त निकालो,
इंतजार इधर भी है

फिक्र छोड़ी है कहा मैंने अभी
यू ही सोचो में उसकी डूबा हूं
वक़्त कब कैसे गुजर गया, क्या पता
अपनी तसल्ली के लिए जीता हूं

तवज्जो, दे रहा है, ये जहां मुझे
तल्ख अब लगती नहीं बातें उनकी
आदतें डाल ली है, तन्हाइयो की
खाली दीवारों से नहीं डरता हूं

काश! कुछ करिश्मा दिखाए ख़ुदा
वक़्त गुजरा, लौटा दे मुझे
या मिटा दे जेहन से यांदे सारी
सफेद संगमरमर पे, नई दास्तां लिखूं।

कुछ मिटा लूं प्यास मैं

जल्दी, क्यों, किस बात की
किसने कहा, कह दो मुझे
बातें, अपनी रात की

अभी, कल ही तो, मिले है हम
कुछ पल, गुजारे साथ में
माना, की है कुछ बाते,
जज़्बात में, रात में

पर, बड़ी जल्दी हो गई
तुम्हे, बांधने की मुझे, पाल से
अब तो जी लेने दे जालिम
मौका मिला है, पहली बार ये

बंधा था, सालो तक, बांध की तरह,
ऊंचा तो था, पर रुका हुआ
अब टूटी है दीवारों,
मदमस्त बना दरियां हूं मैं

अभी तो दीवारों, बाकी है कुछ
रोकने को रास्ता,
तब तक बह लेने दे मुझको
ख़ुदा, दे रहा है रास्ता

प्यासे बहुत है राह में,
बैठे सदियों से सभी
कुछ मिटा दू प्यास मैं
कुछ मिटा लू प्यास मैं

जगा अब हिंदुस्तान है।

ज्वाला अब जलाई है, यूं ना बुझने पाएगी।
भस्म कर देगी तुझे, तब ही शांति आएगी।।

प्रचण्ड अग्नि जल चुकी, भभक उठी मशाल अब।
नसों में रक्त उबल उठा, कटेंगे सर धड से सब।।

दुर्गा चली है शेर पे, शिव ने खोली आंख है।
असुरो की टोली का सभी, करेंगे रक्तपान अब।।

निकल चुकी कृपाण है, म्यान छोड़ कर सभी।
संभल जा पाकिस्तान जरा, जगा अब हिंदुस्तान है।।

देव

आज शहीद हो गया

भारत की औलाद है वो
जो वतन पर मिट गया
एक और देश का लाल
आज शहीद हो गया

चला मिटाने था आतंक
बचाने लहू हमारा
छोड़ सिंदूर अधूरा
घर पर वो नन्ही बाला

बांधे कफ़न वो सर पर
वो शेर बन गया

एक और देश का लाल
आज शहीद हो गया

न्योछावर वो कुंवर
भंवर ले जां हथेली पर
छोटी सी है उमर
ना देखी जवानी पल भर

इस धरती मां के क़दमों में
कुर्बान हो गया

एक और देश का लाल
आज शहीद हो गया

शहीद

भारतवर्ष के शहीदों के नाम

राहें ख़ुदा में मुलाक़ात हुई
कुछ बेदर्द बाशिंदों से
खुद को शहीद समझते थे
नसीब ए जहन्नुम तक ना पाया

लगे थे जमीं पे
ख़ुदा के रास्ते
खुद को ख़ुदा का
बेटा था बताते

खून की नदियां बहाना
बेकसुरो का कतल कर जाना
रोशन करने चले थे
अंधेरा भी ना मिल पाया

काम मेरा भी था कुछ यू ही
बस फ़र्ज़ मेरा था वतन मेरा
जिनको मारते फिरते थे वो
बचाने उनको खून बहाया

मेरे जाने पे, मां ने मेरी
फक्र से सिर है उठाया
पिता का सीना छप्पन का
जहां ये तब देख पाया

बदन पे मेरे तिरंगा
सलामी वतन परस्तों की
जिक्र हर जुबां पे होता है
मुकां यू ही नहीं पाया

ख़ुदा से मिलने का मौका
जन्नत में इक जगह मेरी
लोगो के दिलो में घर मेरा
शहीद यू ही नहीं कहलाता

अब उमर बची नहीं काफी

Happy valentine’s day to singles waiting for Thier love

वो, कहीं तो होगी
मेरी तमन्ना, मेरी आरज़ू
मिल जाए आज अगर
तो बैठूं, कुछ पल
करने कुछ बांते

कुछ गिले शिकवे,
और कुछ शिकायते,
कहा थी गुम वो कहीं
क्यूं थी तन्हा मेरी रातें

उसकी नज़रों से मिला नज़रे
उतर कर जेहन में उसके
काश पता लगा पत
जागी है वो भी कितनी रातें

अब वक़्त गुजर गया काफी
हद से ज्यादा हो गई बेताबी
अब तो मिल जाओ, सनम मेरे
अब बची नहीं उमर काफी

तू कहीं खो गया

This is what, a thought of a daughter, about her father.

Written on request of one of my friend, who lost her dad recently.

May her dad, rest in peace.

चल पड़ती थी हर डगर पे
उबड खाबड़ रास्तों पे
इसी विश्वास में कि
थामी है मैने उंगली तेरी
गिरने लगूंगी जब भी
लड़खड़ा कर
सम्हाल लेगा बड़ा कर
बाहे तेरी

मेरी चुलबुली हंसी,
सुनना तुम्हे भाता बहुत था
तेरी गोद में उछल कर
आना एक सुकून था
मेरे माथे को, चूम कर
जब भी तूने दुलारा
मेरे विश्वास को हर बार
मिलता जुनून था

स्कूल छोड़ने जब भी
तू था मुझे जाता
तुझे बाय कहने में
आता संकोच था
लेकिन, छुट्टी की घंटी
जब भी थी बजती
दौड़ती सरपट तुझ टक
बताना सारा चिठ्ठा जरूरी था

तेरे हाथो का,
अपने सिर पे फेरना
मां से छुपा कर, कुछ पैसे बटोरना
तेरा मुझको गिरने से बचाते हुए
स्कूटर सीखना
मेरी चोट पे, तेरा नाम आंखो से
मलहम लगाना

नम आंखे तेरी
अब भी याद है मुझको
जब आया रिश्ता पहला
मेरे वास्ते
याद है, बही वो
गंगा जमुना तेरी आंखो से
जब तुझे लगा विदा करना जरूरी था
ससुराल, में सब मिला
पर फिर भी, जाने क्यों
कहीं कुछ, गुम सा
हरवक्त लगता था

पर, धीरे धीरे सब धीमा होगया
मैं अपनी जिंदगी में रम गई
तू कहीं गुम हो गया
पर, कभी देर सवेर याद आती थी
जब भी मैं, उस कोने वाली दुकान से
जलेबी खाती थी
वो आज भी, पूछते है
बेटा, एक जलेबी और लेलो,
पर, तेरी तश्तरी से चुरा कर
खाने में जो गुरूर था
वो गुरूर, कहीं रह गया
तेरी यादें ही बची है अब
तू कहीं खो गया
तू कहीं खो गया

देव

स्याह को कुछ हसीं पाया

इश्क़ क्या है, समझने की कोशिश में
उमर तमाम निकाली
पर, हर बार, जो सोचा, जो समझा
उससे, अलग पाया

कभी फ़र्ज़, तो कभी मर्ज बना
कभी, बेगैरत सी सिसकियों में पाया

दामन, अपना साफ रखने के वास्ते
कभी, रास्ते में कहीं, छोड़ गया

मिल जाता है, अब भी, रास्ते में अक्सर
पर, साथ में चलते, देखते किसी और को पाया

सुकून दुंडने चले थे , कुछ कदम
बेपनाह दर्द का समंदर, नजर आया

बेगैरत बेपरवाह रहना, खुशगुवार लगा
कच्चे अधूरे रंगो से, स्याह को कुछ हसीं पाया

जज़्बात


वो कभी कभी, कुछ परेशान नज़र आती है
मेरी आदतों से परेशां हो जाती है
मुझे खीजाने के वास्ते, कुछ ऐसा कर जाती है
अब मुझे उसकी मासूमियत पे हसीं आती है

दिन भर की भागदौड़ में भी, कई बार मुझसे टकराती है
शाम के माहौल में, मेरा दरवाजा खटखटाती है
बहाने बन जाते है, दीदार करने को
कभी चाय पीने के बहाने, बुलाती है

हर सुबह, यकीनन मेरी याद आती है
देख कर मुझको, थोड़ा लजाती है
थोड़ा शर्माती है
पर कहीं, खबर ना लग जाए,
हाल ए दिल का जहां को
अपनी हसीं से जज्बात छुपाती है

देव

अहसास


अहसास तेरे होने का
हर पल मेरे यही
आस पास क्यूं होता है
अब, मैं अकेला तो होता हूं
पर तन्हा क्यूं नहीं रहता हूं

तेरी, खुशबू मेरे बिस्तर में
मेरे कपड़ों में बसी क्यूं है
तेरी, बातो में, मुझको
दिखती जिंदगी क्यूं है

तू होती है सामने
या सपनो में कभी मिलती है
तेरी, मासूम अदाएं मेरे
दिल को झकझोरती क्यूं है

आजकल, हर वक़्त,
मेरे जेहन में
तेरी ही आवाज़ आती है
लश्कर साथ है
पर देती सुनाई सिर्फ तू क्यूं है

पूछता हूं सवाल खुद से
तो कभी खुदा से
दुआ मेरी जब निकलती है
उसमे भी नाम तेरा क्यूं है
उसमे भी नाम तेरा क्यूं है