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मैं

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मुझे वक़्त भी ना ठहरा सका
दरिया हूं मैं, बस बहना जानता हूं
विशाल है पहाड़, लंबे है मैदान
काट कर चट्टानों को, बढ़ना जानता हूं

कश्तियां हजारों, मुझे चीरती है हर दिन
बांधों से बांधने की, कोशिशें है अपार
ठहर जाता हूं, कुछ पल को, खुश करने उन्हें
पर जब उफान आता है, फिर निकल जाता हूं मैं

मेरी लहरों से खेल, कुछ अठखेलियां कर
बसा चमन अपना, खुद को आबाद कर
मेरे पहलू में, बना एक आशियां
मेरे लहुं से सीच, बागान अपना

मैं शांत बहुत हूं, हूं मैं मस्त मौला
नहीं मकसद मेरा, उजाड़ना घर तेरा
पर जब तू, मेरी जड़ों को काटता है
बिफर जाता हूं मैं, बिखर जाता हूं मैं

फिर से एक नया, चमन बसाने को
इंसा को, गलतियों का सबक सिखाने को
धरा को फिर से संतुलन में लाने को
रोद्र रूप दिखाता हूं मैं
विनाश बन जाता हूं मैं

देव

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