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आज तो मैं भी भभक भभक कर रो पड़ा।
सालो हो गए थे रोए हुए
लग रहा, शायद भूल गया हूं
पर ये क्या,
जो भरा पड़ा था, वो निकल गया।
धधकता लावा, उमड़ गया।
सोया था जो ज्वालामुखी युगों से,
भभक पड़ा।
आंसूओं का ज्वार था आया
बादलों को बरसना आया।
और नम आंखो से, कुछ गमों की
बारिशे धुआंधार हुई।
बुदबुदाते हुए निकलते शिकवों से
कुछ पैबंदो की बाते हुई।
गरजती सी निकलती गलियों से
दिल ठंडा किया।
बद्दुआओ की खोल पिटारियों से
उसे तोहफा दिया।
अब नहीं आता मुझे
मुझ पर तरस
अब नहीं होता मुझे
यकीं हर किसी पर
अब नहीं रिश्ते भारी
मैं झेल पाऊंगा
अब जो टूटा, फिर नहीं कभी,
जुड़ मैं पाऊंगा
देव
