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नन्हों को भी, भुला जाते है,

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भूलने की कोशिशें करी हजार,
मगर भुला ना सका, उस पल को, शाम याद है मुझे आज भी,
जब दिल मेरा, टूटे शीशे की तरह
बिखर गया था,
कुछ पल ऐसा लगा, जीवन
अधजली लाश बन गया था,
घिन्न सी आने लगी,
जीने की चाह मिट सी गई,
बस, तुम ही तो थे,
मासूम, नटखट, अनजान नफरतों से,
तुतलती सी आवाज में,
और प्रखर अंदाज में,
पापा की आवाज से जागा, उठा,
फिर चल पड़ा,

चला नहीं था, अकेला,
तुम भी तो साथ थे,
तुम्हारे मासूम हाथो में
पकड़ी मेरी अंगुली,
काफी थी मगर गिरने से बचाने को,
और तुम्हारे चेहरे से आती हसीं,
काफी थी, जिंदगी आगे बढ़ाने को,
प्रश्न तो थे, मगर उत्तर कठिन थे,
पूछता भी किस्से, मामले संगीन थे,
लोग तो बहा देते है, गम आंसुओ में,
हालात ये थी, की आंसू भी मजबूर थे,
तब ही जाना मैंने, मुश्किल वक़्त में
कांधे भी साथ छोड़ जाते है,
जो निभाने की बात करते है रिश्ते,
अपने अहम के खातिर,
नन्हों को भी, भुला जाते है,

देव

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