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पैरों की जूती नहीं मानो

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बस हंस कर क्या बोल ली,
कुछ बातें क्या कर ली,
थोड़ा मजाक, थोड़ा गुनगुनाना,
एक शाम साथ, पब में बिताना,
थोड़ा पीना, थोड़ा बेहकना,
थोड़ी सी शरारत करना,
और बस, मान लिया,
की मेरी हां है,
कितनी गलतफहमियां पाल रखी है,
हमारे जरासे खुलेपन ने,
तो जान ले रखी है,
ना को ना कहा समझते है,
ना कहने पर भी, पीछे पड़ते है,
तुम चाहते हो, मतलब ये नहीं,
हम भी वही चाहे,
जरूरी नहीं, की तुम्हारे सुर
में हम ताल मिलाए,
वक़्त बदल गया है यारो,
तुम भी जागो,
नारी को, अब तो अपने
पैरों की जूती नहीं मानो।।

देव

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