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तेरे चेहरे पर, वही हसीं, लौटाऊंगा

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कल कुछ सफ़र पर निकल पड़ा,
तेरी याद में, जिस मोहल्ले से,
तू विदा ले चुकी है,
यूं गलियों से वाकिफ हुआ,
कुछ चेहरे, जो की अब भी,
तेरे आस पास दिखते है,
उनसे मुलाक़ात हुई,
तेरे बारे में बहुत बात हुई,
तेरे घर के उस कोने वाले कमरे में,
जहा कुछ तस्वीरे टंगी रहती थी,
वही कोने में, किताबों के ढेर में,
एक पुरानी सा, थोड़ा छिपा सा, एलबम मिला
और तेरी कुछ तस्वीरों से,
रूबरू हो गया,
कुछ नहीं बदला सा लगा,
जो आज है, वही खूबसूरती,
तब भी नजर आ रही थी,
वैसे सच कहूं,
तुम उस उल्टे पल्ले की सारी में,
गजब ढा रही थी,
माथे पर सिंदूर, और तुम्हारी हसीं,
कुछ और ही कहे जा रही थी
तेरी ख़ुशी, ढेर नगमे,
बयां ही रही थी
और भी बहुत से, जज्बात देखने को मिले,
तेरे हसीं में छिपाए, हालात भी,
देखने को मिले,
मगर, अब वक़्त कुछ और है,
बेहतर है, इं पन्नों को, बंद ही कर डालूं,
बस, तेरे चेहरे की हसी,
अपने मन में बसा लूं,
इक दिन, तुझे खुश देखना
फिर चाहूंगा,
तेरे चेहरे पर, वही हसीं, लौटाऊंगा,

देव

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