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ये मां कहलाती है।।

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सम्हाल कर, पतेली में, चम्मच चलाती है,
एक एक ग्रास, नन्हों की थाली में डालती है,
कहीं भूखे ना रह जाए, बड़े प्यार से खिलाती है,
और खुद, बचे कणों में मिला पानी जरा,
पीकर सी जाती है, ये मां कहलाती है।

ना जाने कितनी रातें, गीले में खुद सोकर,
सूखे में सुलाया हमे, खुद जाग कर,
राते काली, लोरी गा, सुलाया हमे,
अपने सपनों को कर अलविदा, मेरे
सपनो में खो जाती है, ये मां कहलाती है।

है बुढापा मगर, कम कहा प्यार हुआ,
हो गए बड़े तो, बचपन तो नहीं खो गया,
आज भी, चाए की प्याली, दो पल में,
लेकर आती है, बड़े चाव से, खाना
बनाती है खिलाती है, ये मां कहलाती है।

व्यस्त है हम, जिंदगी में अपनी इस तरह,
ना वक़्त देते है, ना प्यार के दो बोल बोल पाते है,
बड़े हो गए, बस अपनी जिंदगी जीते जाते है,
महीनों में गलती से मिलता है जब नंबर,
तू फ़िक्र ना कर, मैं ठीक हूं, ख्याल रखना,
मुस्कुरा कर बोल जाती है, ये मां कहलाती है।।

देव

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