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अब स्वयं दुर्गा, वध पर निकलेगी।।

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टूटी तो मैं थी ही, मगर
अपनों ने ही बिखेर दिया,
ना चाहते हुए भी, एक टुकड़ा,
कभी उन्हें लगा, कभी मुझे लगा।

कोशिशें लाख करी मैंने,
घावों को अपने, ढकने की,
मुस्कान में छिपी, बेदर्दी से,
नासूर मुझे अपनों ने दिया।

ना स्वतंत्रता दी, ना कैद किया,
कायदों का सारा खेल किया,
दो आंसू, दिखा दिखा कर यूं,
मेरा जीवन, बर्बाद किया।

स्त्री होकर, स्त्री ही ने,
स्त्री का दर्द, ना पहचाना,
स्त्री ने ही, स्त्री का यहां,
हर मोड़ पर है, तिरस्कार किया।

अपनों को अपना समझ लिया,
अपनों पर, इतना विश्वास किया,
अपनों के खातिर मैंने अब तक,
अपनी कोख पर, अत्याचार किया।

बहुत हो गया, बहुत सहन किया,
अब होगा वहीं, जो नहीं किया,
अब नहीं प्रपंच चलने वाला,
अब नहीं ये रूप डरने वाला,
अब गरज दिखाऊंगी मैं भी,
अब अस्त्र उठाऊंगी मैं भी,
अब नहीं, संहुगी अत्याचार,
अब नहीं करूंगी अत्याचार,
अब चुप्पी नहीं, आवाज उठेगी,
अब स्वयं दुर्गा, वध पर निकलेगी,

अब स्वयं दुर्गा, वध पर निकलेगी।।

देव

14/09/2020, 1:01 pm

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