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कहने को तो साल बीस हैं

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कहने को तो साल बीस, संग बीमारी लाया है,
पर देखो, अलबेला सा ये, खुशियां कितनी लाया है,

वक़्त नहीं है, कहने वाले, वक़्त जमा कर बैठें है,
हर घर में फैले है, हसीं ठहाके ,

कभी अकेले, कहीं दूर बसे थे हमसे मात पिता,
किलकारियां गूंज रही है, लगे खुशियों के मेले है।

दूर हुए शिकवे मन के, दीवारें दिलो की ढ़ह गई है,
इस मिलन की बेला में, राधा कहा अकेली है।

अश्क अगर, कुछ रह भी गए तो, फिक्र नहीं अब तेरी है,
आजा हम है, साथ में तेरे, अब मधुशाला भी खुल गई है।।

देव

19/10/2020, 8:04 pm

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