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महाभारत
ना अस्त्र लिए, ना शस्त्र लिए,
अपने ही थे दो हिस्से किए,
सत्य यहां, और शक्ति वहा,
धर्म और अधर्म में बांट दिए।
हर कोई वहा, था अपना,
अपनो ने अपनो पर थे वार किए,
छल और धोका था हर दिशा में,
नारी की मर्यादा भंग किए।
चल पड़े थे धर्म बचाने को
सत्य को विजय दिलाने को
हाथ में थामे लगाम वो बस,
चले पड़े थे हरि अब रण को।
ये युद्ध नहीं, महायुद्ध ये था,
धरती पर एक, प्रलय ये था,
होनी थी असंख्य नरबलि,
रक्त रंजित, बिस्तर ये था।
दिखने को थे, सब काट रहे,
एक दूसरे को थे सब मार रहे,
नहीं दिखा किसी को, सुदर्शन,
चल रहा था, मारने सबको झटपट।
नहीं बचा था कोई उस रण में,
जो बचा था, वो था भ्रम मन में,
बस धर्म की, एक स्थापना थी,
कृष्ण की कैसी माया थी,
कृष्ण की कैसी, माया थी।।
देव
29/10/2020, 11:12 pm
