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मर्द जात ही बेकार होती है

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मर्द जात ही बेकार होती है,
जाने कितनी बार सुन चुका हूंँ
हर जबान से सुन चुका हूंँ,
और इसी भ्रम में, ना जाने,
कब वक्त बदल गया,
मगर ये वाक्य, ना गया,
जब देखो, जहाँ देखो,
जो कानून, नारी को,
शक्ति देने के लिए बना था,
उसी कानून का बना खंजर,
कितनी ही बार, घोपा गया।
रुक, नहीं रुका ये सिलसिला,
जिन्दगी के हर मोड़ पर,
यही विचार, हर बार मिलता रहा,
और मर्द, प्यार के बदले,
हर बार, सब कुछ देता रहा।
यूं तो नहीं, कि दहेज बस मर्द मांगते है,
घरों में तो अक्सर, औरतों के राज होते है,
बेचारे को तो, हर बात पर सोचना पड़ता है,
नौकरी नहीं, तो प्यार के लिए भी
भटकना पड़ता है। हिम्मत है गर
औरत में, तो अपना कर दिखाए,
बेरोजगार से रिश्ता जोड़ कर दिखाए,
क्या वो दहेज नहीं है, जब
तनख्वाह है पूछी जाती,
गाड़ी बंगले और बैंक बैलेंस की,
इंक्वायरी है की जाती,
आजकल तो एक और,
फेरहिस्त तैयार है, अकेला
रहता है, या सिर पर
मां बाप का भार है,
जरा बताना कहीं पीता तो नहीं है,
मगर बेटी को मेरे, ऑकेजनली
पीने का बुखार है,
देखो, ओपन माइंडेड होना चाहिए,
कपड़े चॉइस के पहनेगी,
माना, हम भी कल्चर मानते है,
मगर ससुराल मे, इसकी चलेगी।
प्यार तो करलेगी, मगर बताओ जरा,
इसके हिस्से में, कितनी प्रॉपर्टी मिलेगी।
और फिर, सब कुछ अपना कर,
पल में पराए हो जाते है,
489, 21, 22 और ना जाने कितने,
कानून के सेक्शंस लगाए जाते है,
जिसे जान कहते थे कभी,
उसके जान के लाले आते है,
दहेज के नाम पर, फिर से
दहेज वसूला जाता है,
पैसा तो पैसा, इज्जत का
फालूदा भी किया जाता है,
और फिर से, वही दुहाई
अनायास ही, सुनाई देती है
मर्द जात ही बेकार होती है
मर्द जात ही बेकार होती है।।
देव
31/01/2021, 1:34 pm

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