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पौशिका

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नन्हे नन्हे हाथों को
बड़े सलीके से हिलाते हुए
चेहरे की पलकों को बनाते
आंखो को झिलमिलाते हुए
कभी होठो को मिचकाना
कभी थोड़ा रुक कर
कुछ सोच कर
कुछ और बोल जाना
उसकी लगातार चलती बातों का
ट्रेन की पटरी की तरह
दूर तलक जाना
और हर एक प्रश्न पर
बड़ा सा निबंध
उत्तर में पाना
फिर भी, किसी के माथे पर
हल्की सी शिकन का ना आना
जैसे, पैसों की बारिश में
बिना थके बटोरना
लगे थे सब उसकी तुतलती जबान में
उसकी सारी कहानी सुनना
कितनी, परवाह से हर बात को
बड़े गौर और सोच कर बताती है
वो हर बात समझने के लिए
ठहर सोच कर, शब्द लाती है
कभी सोचता हूं कितनी प्यारी सी
दिखती है ये
कभी सोचता हूं, हमसे बहुत आगे
निकली है ये
अभी उतरी पारियों के देश से
परी है ये
कोई और नहीं, नन्ही सी
प्यारी से, पौशिका है ये।

देव

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