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समंदर भी आज शर्मा गया,
तेरे हुस्न के आगे,
लहरों का उछालना भुला,
देखो, कितना शांत है,
जैसे, कह रहा रहा हो,
जाने कहा से आयी है,
मेरे दिल में उछाल कई है,
दिल करता है,
उछल कर इसे छु लू,
पर अगर, ख़्वाब हो,
कहीं मिट ना जाए मेरी लहरों से,
इसीलिए, आज शांत हूं,
बस, टकटकी लगाए देख रहा हूं,
जिसकी चाह में, सालो से,
अपनी चौखट कूदने की,
कोशिश में लगा था,
वहीं, मेरे आंगन में आ,
मेरे दिल में हलचल मचा रही है,
मुझे, समंदर से दरिया बना रही है।।
देव
