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क्यूं, इश्क़ से इतना डरता है

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कल एक दोस्त ने पूछा,
यार देव, तू दिखता कुछ और है,
जीता कुछ और,
कहने में तो प्रैक्टिकल बनता है,
पर तुझमें इमोशंस की भरमार है,
क्यूं ये दोगली जिंदगी जीता है,
क्यूं, इश्क़ से इतना डरता है।

जवाब मेरा कुछ यूं था,
यार, खुदा ने मुझे कुछ अजीब बनाया है,
हर किसी से मोहब्बत करना सिखाया है,
नफरत क्या होती है, मैं नहीं जानता,
दुश्मन जिनको कहते है,
उन्हें भी गलें लगाया है,

हां, प्रैक्टिकल भी हूं, पर जानता हूं,
कि मोहब्बत में खुदा बसता है
इसलिए दिल तोड़ने से डरता हूं,
ये पाप मैं नहीं कर सकता हूं,

ऐसा नहीं, कि मोहब्बत नहीं कर सकता हूं,
जब करी, बेहद करी, और
जब भी करूंगा, हदें पार कर दूंगा,

पर, अभी वक़्त का तकाजा,
कुछ और कहता है,
ना इश्क़ करने की इजाजत,
ना किसी को प्यार करने की सलाह देता है,

हां, इमोशंस मुझे भी आते है,
दिल मेरा भी धड़कता है,
अक्सर हूर को देखकर,
इंसान हूं, कुछ कदम बढ़ा भी देता हूं,
समेटने को कुछ लम्हें हसीन,

कभी कुछ लिख भी देता हूं,
बयां करने को हाल ए दिल,
पर, ईमानदारी जरूर बरतता हूं,
सबसे पहले, सच मैं बोलता हूं,
बस, यही लोग मुझे प्रैक्टिकल मान लेते है,
मेरी सच्चाई को, मेरी कमजोरी
का नाम देते है,

कोई बात नहीं, मैं यूं ही सही,
मेरे अल्फाजो पर, हर कोई
करे वाह वाह, ये जरूरी तो नहीं,
बस, दोस्त है, जो खास है,
जब भी तन्हाई के बादल है छाते,
रहते मेरे आस पास है,
जानते भी है मुझको,
सलाह भी है देते,
मेरे प्रैक्टिकल के पीछे छिपे,
इमोशंस भी है समझते।।

देव

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