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जाने कहा, जिंदगी मुझे, ले जा रही थी

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पुरानी किताब के फटें पन्नों को,
बड़ा सम्हाल के, पड़े जा रहा था,
बड़े इत्मीनान से, वो सुन रही थी,
मैं अपनी कहानी कहे जा रहा था,

यूं तो वो, बहुत कम बोलती थी कभी,
मगर, कुछ वक़्त से अंदाज अलग था,
किस्सों के उसके पास, हुजूम बहुत था,
लेकिन, आज फिर शांत सुने जा रही थी,

कुछ बचपन की बातें, जवानी के किस्से,
वो जाड़े की रातों, में बाहर था सोना,
बताएं उसे, घरवालों के नखरे,
उस छोटे स कमरे से, फिर जिंदा होना,

उसकी अदाएं, जो मुझको रिझाएं,
नज़रे झुका कर, जब फिर से उठाए,
हाथो से उसके, हाथो का मिलना
तरंगों का इक, लय के साथ उठना

देखे है मैंने, उन बूंदों के नखरे,
रुकी थी नयनों में, गिरने से बचने,
ख़ुशी के थे, या गम के थे आंसू
कैसे कहे, जो कहते ये आंसू,

उधेड़ बुन थी दिल में, चली जा रही थी,
उसकी बातों से, समझ आ रही थी,
दिल की धड़कन मेरी, बड़े जा रही थी
जाने कहा, जिंदगी मुझे, ले जा रही थी,

क्रमशः

देव

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