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या, जिंदगी बाहर निकलती है

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ये लो, फिर आ गया,
कहने को तो मोहब्बत,
इजहार करने का मौसम है,
दिल में छिपी जज्बात,
बताने के दिन है,
लेकिन इन्हे भी तो किश्तों में बांट डाला,
लगता है, प्यार पर भी,
ब्याज लगा, लोन दे डाला,

अहा, रुक जाओ,
क्या करते हो,
अरे, सब सात दिन का कोटा
एक दिन में पा लोगे,
बात कुछ, रोज डे से शुरू होती है,
ये ही तो पहला, कठिन मुकाम है,
वरना मोहल्ले में झाड़ू से
पिटाई होती है,
अगर, रोज, रोज ही रहा,
तो प्रपोज तक,
हड्डियां साबुत रहती है
चॉकलेट और टैडी डे तो
आसानी से गुजर जाते है
मगर प्रोमिस डे में,
कन्फ्यूजन की भरमार होती है,
फिल्मी डायलॉग्स की,
बौछार शुरू होती है,

बड़े अरसे से, बस जरा सा,
छू लू उसको, ये अरमान,
लेकर भटके थे आगे पीछे,
इस मोड़ में आकर,
कुछ हालत खराब होती है,
डर भी लगता है,
ख़ुशी भी मिलती है,
गर बाकी दो दिन,
सही गए तो, या तो,
जिंदगी भर बहार रहती है,
या, जिंदगी बाहर निकलती है।।

देव

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