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जहा से चला था, वही, खुद को खड़े पाया है

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आज फिर वही दौर,
लौट आया है,
जहा से चला था, वही,
खुद को खड़े पाया है,

बेफिक्र, बिंदास हुआ,
करता था कभी,
बेकार की बातों में,
गुजरता था दिन,

अनजान से शहरों में,
सबको पर भटकना,
कोई तो मिले अपना,
बेसबर होकर ढूंढ़ना,

फिर तुम मिले, लगा,
मंजिल मिल गई,
जो थी जिंदगी, वो
वैसी ना रही,

थोड़ी खुद से भी,
मोहब्बत हो गई,
जीने की और,
चाह हों गई,

मगर, बस एक पल में,
टूटे ख्वाब, बिखरी मंजिले,
मुंह मोड़ कर , वो
पल में चल दिए,

आज फिर वही दौर
लौट आया है,
जहा से चला था, वही,
खुद को खड़े पाया है।।

देव

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