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मैं बस, जिंदगी को घसींटता रहा

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लोग समझते रहे,
और में चलता रहा,
कारवे भी पीछे छूटते रहे,
और मैं चलता है,
तलाश, बस एक मंजिल की थी,
और वो भी, मेरी कहां थी।

हुनर लिखने का मिला,
शायद, उसके लिए था लिखना,
कर सकूं जज्बात बयां,
जो कभी कह ना सका,
कह भी दिया बहुत कुछ,
मुस्कुराई तो वो भी थी,
अरमान, उसके कुछ और थे,
और वो भी, मेरी कहा थी।

कुछ ने कहा, इंतेज़ार,
बेमानी होता है,
कुछ ने कहा, वक़्त दो तो,
प्यार जरूर होता है,
उसने कहा, बड़ा मुश्किल है,
मुझे नहीं प्यार होता है,
मैं बस, जिंदगी को घसींटता रहा,
और वो भी, मेरी कहां थी।।

देव

11 may 2020

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