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कान्हा

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गगरी भर यमुना से,
जब मैं चलूं,
तेरी मुरलिया की,
धुन से मिलूं।

मैं बावरी हो, पनघट,
पर नृत्य करू,
कान्हा, मैं तेरी,
बावरी हूं।

बातें करे जग सारा,
हुआ क्या तुझे राधा,
क्यूं खोई खोई सी, लागे तू,
मन में क्या है, बोल जरा।

मन कहां अब मेरा है,
कान्हा का ही, बसेरा है,
श्याम की दीवानी हूं,
बांसुरी धुन पर, नाचूं हूं।

सांवरा सलोना सा,
रूप उसने पाया है,
हर गोपी को, सांवरे ने
राधा बनाया है।।

देव

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