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जब खानकती है चूड़ियां।

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नजरिया है, सबका अलग अलग,
किसी को बंदिश लगती है,
किसी को खूबसूरती।

हाँ जनाब, सही पहचाना आपने
चूड़ियों की ही बात कर रहा हूं,
मॉर्डन कहलाए जाने वालो से,
तारीफ की उम्मीद नहीं कर रहा हूं।

रंग बिरंगी, पतली मोटी,
चमचमाती चूड़ियां,
मन को भाती, पहन इतराती,
जाने कितनी गोरियां।

नहीं समझती बंदिश इनको,
रूप निखारे ये चूड़ियां,
वार त्यौहार, बाजारों में,
पहनके निकले गोरियां।।

उनसे पूछो, मोल है क्या,
नहीं मिलती, जिन्हें चूड़ियां,
सूनी कलाइयां, खिन्न हो बैठे,
तड़प सी जावे, गोरियां।

और असर कुछ यूं हुआ,
के आवाज पर, मंत्रमुग्ध हुआ,
लय के साथ, कहीं आस पास,
जब खानकती है चूड़ियां।

गोरी जब और करीब आई,
प्यार से जब, थामी उसकी कलाई,
थोड़ा शरमाई, कुछ बोल ना पाई,
मगर, बहुत कुछ कह गई, चूड़ियां।

यूं ही लोग, कहते है बंदिश इन्हें,
नजरिया है, सबका अलग अलग,
किसी को बंदिश लगती है,
किसी को खूबसूरती।

देव

27/10/2020, 8:42 am

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