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समाए जहाँ भर की मुश्किलें!

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समाए जहाँ भर की मुश्किलें,
मुस्कुरा रही थी वो,
जख्म खाए है हजार उसने
और खिल खिला रही थी वो।

यूं तो नाजों से पाला था उसको,
कहा था लक्ष्मी कभी,
कभी कहा था देवी उसको,
उसके ख्वाबों से, ख्वाहिशें बनती थी
आंख रोज उसकी, स्वर्ग में खुलती थी,
और ना जाने, कब, वो वक्त बदल गया,
एक पल में, ना जाने क्या हो गया।

थाम हाथ उसका, ले चला था वो,
पलको में बैठा उसको, खड़ा था वो,
कदम उसके, आंगन में कुछ खास ही तो थे,
बड़े सुनहरे, उसके दिन रात भी तो थे,
किसी के जाने से, संसार उसका क्यूं लूट गया,
एक पल में, ना जाने क्या हो गया।

अश्क आते भी है, चुप चाप आते है,
गम अक्सर दरवाजा खट खटाते है,
अक्सर चीत्कार उठती है, सूने दिल से उसके,
चुटकियों में, अपने दिल तोड़ जाते है,
सब है, मगर दिल क्यूं तन्हा हो गया है,
एक पल में, ना जाने क्या हो गया है।

मगर, फिर भी,
समाए जहां भर की मुश्किलें,
मुस्कुरा रही थी वो,
जख्म खाए है हजार उसने
और खिल खिला रही थी वो।।

देव

29/11/2020, 10:58 am

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