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शून्य मुझे है पसंद

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कुछ यूं जिन्दगी को जिया मैंने,
शून्य से, कई बार, जिया हूंँ मैं।
यूं नहीं, कि शून्य मुझे है पसंद,
मगर, शून्य का अफसोस नहीं, करता हूंँ मैं।
शून्य से अनंत की, दूरी जानी है,
इसीलिए, गिरकर फिर सम्हलता हूंँ मैं।
लोग मिलते है, फिर बिछड़ जाते है,
फिर शून्य से, शुरू करता हूंँ मैं।
देव
04/02/2021, 9:20 pm

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