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नई दास्तां लिखूं

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बारिशे तब गिरती है
जब सुकून नहीं होता
भीगे हुए दिलो पे घाव करती है
दर्द लेकर दुआ देने वालो
कुछ वक़्त निकालो,
इंतजार इधर भी है

फिक्र छोड़ी है कहा मैंने अभी
यू ही सोचो में उसकी डूबा हूं
वक़्त कब कैसे गुजर गया, क्या पता
अपनी तसल्ली के लिए जीता हूं

तवज्जो, दे रहा है, ये जहां मुझे
तल्ख अब लगती नहीं बातें उनकी
आदतें डाल ली है, तन्हाइयो की
खाली दीवारों से नहीं डरता हूं

काश! कुछ करिश्मा दिखाए ख़ुदा
वक़्त गुजरा, लौटा दे मुझे
या मिटा दे जेहन से यांदे सारी
सफेद संगमरमर पे, नई दास्तां लिखूं।

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