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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,
मतलब, कर्म करो, फल की इच्छा ना करो,
सच कहा है, और सच भी है,
मेरे जीवन का, सत्य भी है,
जो ना सोचा कभी, वो पाया है,
सोचने में वक़्त नहीं गंवाया है,
फिर इश्क़ में क्यूं नहीं,
उससे इश्क़ है कह दिया,
बाकी सब भगवान पर छोड़ दिया,
और हां, किया है, तो ईमानदार भी हूं,
उसके जज्बातों से, वाकिफ भी हूं,
अपना कर्म नहीं छोड़ रहा हूं,
उसके लिए, जो बन पड़े, वों कर रहा हूं,
मेरा इश्क़ जबरदस्ती नहीं है,
उससे हां कहलवाने की जिद नहीं है,
उसका अपना, एक व्यक्तित्व है,
मेरा ही नहीं, उसका भी तो अस्तित्व है,
वो मुझे चाहे, ना चाहे, मर्जी है उसकी,
उसकी ना में भी, नहीं है गलती उसकी,
और ना भी है, तो मुझे मंजूर है,
क्यूं की, मुझे प्यार है, ना कि फितूर है,
और मेरी मोहब्बत तो मेरे साथ रहेगी,
वो ना सही, साथ उसकी याद रहेगी।।
देव
