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शायद, कहीं खो गया था, जो मेरा था, तुझमें

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निकला तो था, सफ़र में, मंजिल तलाशने,
तुमसे क्या मिला, तुम्हे मंजिल बना लिया।

और तुम, जरा जल्दी में थी, मगर ठहरी सी,
पास, मगर दूर बहुत, हाथ भर मगर दूरी बहुत।।

काफी वक़्त से खड़ा था, उस मोड़ पर,
जहां से गुजरने की, उम्मीद थी कभी तेरी।

अब चल पड़ा, रास्तों पर अपने, खुद की तलाश में,
शायद, कहीं खो गया था, जो मेरा था, तुझमें।

देव

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