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ख्वाहिश जीने कि

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बस, चलती रही, सब छूटता सा गया,
ख्वाबों को मेरे, कोई अंत नहीं मिला,
साथी मिले, कोई हमसफर ना बना,
शायद, कोई मेरी ख्वाहिशों का ना था।
बहुत चल ली, अब थक सी गई हूॅं,
जिन्दगी से बहुत दूर निकल गई हूंँ,
बस, थम जाऊं, थाम लू हाथ कोई,
ख्वाहिश जीने कि करने लगी हूंँ।।
देव
29/01/2021, 9:15 am

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