ख्वाहिशों के दरिया से,
एक ख्वाहिश मैंने भी उठा ली,
एक सुबह बस मेरी हो,
दुआ ये खुदा से मांग ली।
तसल्ली दी थी, बचपन से,
सब्र करो, तुम्हारा नंबर भी आएगा,
अब तो उम्र हो चली,
ना जाने सूरज कब ढल जायेगा।
अब तो सब्र का बांध, झलकने लगा है,
चेहरे पर झुर्रियों का, पता चलने लगा है।
थकी पलकें है, ना जाने कब,
नज़रों का पर्दा गिर जाएगा।
माना, थक गई हूँ मैं,
मगर हारी नहीं हूंँ,
हिम्मत अब भी है मुझमें,
शिकन इक नहीं है
जिंदा हूंँ, और जिंदादिल भी हूंँ,
जिन्दगी के नशे में, चूर भी हूंँ
आज बस, एक ख्वाहिश ही,
तो मैंने मांगी है,
बाकी कल मांग लूंगी,
ये ठान ली है।।
देव
16/01/2021, 6:55 pm