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पहचान नारी की।।।

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आज मैं खुद से, अपनी पहचान पूछ डाली
कौन हूं मैं, क्या नाम है मेरा
मकसद क्या है कुछ तो पता चले
या यूं ही, लोगो के कहने को मानती रहूंगी
मैं यू ही, अनजान रास्तों पे जाती रहूंगी

वैसे, मेरे प्रश्नों का जवाब शायद
मुझे भी ना पता था
इतना मुश्किल होगा खुद को जानना
ना जान सकी मैं

क्यूं लोग मुझे, अपने इशारों पर चलाते है
और क्यूं मैं, विश्वास से चल भी देती हूं
क्यूं नहीं पूछती मैं, प्रश्न उनकी नसीहत पर
क्यूं नहीं सोचती मैं, मेरा क्या मुकाम है

नाम भी मेरा, मेरा कहा है
जब जिसने चाहा, एक दे दिया है
बचपन से, जो कहा करती रही मैं
अपने अंदर की घुटन सहती रही मैं

ख्वाहिशों को दफना, कभी परिवार
कभी समाज की मर्यादा रखी
अपने रूप को भी, यौवन की दहलीज पर
भी ना निहार सकी मैं

एक घर में बेटी बहन,
कुछ पल में किसी और के घर
कभी बहू बन चौखट के रही
तो कभी मां बन, आंगन को संवारती रही मैं

लेकिन जब भी, अहम मसलों की
बात होती है
हर जगह मर्दों की साख होती है
सुना है, जमाना बदल गया है
पर बेड़ियां कहा खुली दिमागों की
आज भी, मुझसे ज्यादा, उनकी औकात होती है

देव

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