दूर है तू बहुत, पर पास है प्यार तेरा।।

आज बड़े दिनों बाद, इक मुलाकात उससे हुई।
कुछ बीती बाते, कुछ यादें ताजा हुई।।

बेसब्र मुलाकातों का भी इक दौर था।
उसके साथ बिताया, हर एक पल अनमोल था।।

अब फिर, वहीं बातें, वहीं राते याद आती है।
तू सामने होती नहीं, तेरी तस्वीर कभी दिख जाती है।।

हो लेता हूं खुश, कर यार दीदार तेरा।
दूर है तू बहुत, पर पास है प्यार तेरा।।

देव

मेरे हर अंश में समाया, उसी का रंग है…

आज मैंने खुदा के आगे सिर झुकाया था
उसको, जल्दी बुला लो, ए खुदा
यही पुकारा था

शिद्दत से घूरती थी, नजर रखती थी
छत के निशानों पर
कहानी गड़ती थी, ग़ज़ल लिखती थी
बीती बातों पर

बड़ी उम्मीद में जीती थी, दुआ करती थी
मस्जिद की चौखटो पर
तवज्जो देती नहीं, अल्ला हाफ़िज़ कहती थी
मौत के फरिस्तो को

पर आज, लेटी है, बड़े इत्मीनान से अपने
जैसे, कह रही हो,

बेटा,
बहुत कर ली मेरी सेवा
अब जा, जीले जिंदगी अपनी,
बाकी है, काफी उमर तेरी
ना रोना, मुझको कर याद तू
दर्द मुझको ही होगा यूं
जो ना खुशी चेहरे पे तेरे हो
भला मुझे जन्नत मिलेगी क्यूं

मैं अब भी उसका ख्याल रखती हूं
जहां भी वो हो, खुश उस रखती हूं
खुश हूं कि अब उस दर्द नहीं होता
जब भी आंखे मूंडती हूं
उसके करीब होने का अहसास है होता

वो मां है मेरी, मै उसका ही तो अंश हूं
मेरे हर अंश में समाया, उसी का रंग है
मेरे हर अंश में समाया, उसी का रंग है

देव

तेरे आगोश में समा ले

सदियों गुजर गई, मुझे चैन से सोए हुए।।
कुछ पल ही सही, तेरे आगोश में समा ले।

कब से घूम रहा हूं मै, लेकर फिक्र बोझ।
रख के सिर तेरी गोदी में, जरा बाल सहला दे।।

ख्वाहिश नहीं कि तू दे साथ उमर भर।
जब साथ हो मेरे, अपने हाथो से खिला दे।।

तेरे माथे पर शिकन, अच्छी नहीं लगती।
मेरी हसी है क्यूं की, तू मुस्कुरा दे।

देव

हमे तो दिल जवान चाहिए..

कोई वक़्त था, जब लोग सलाम ठोक कर जाते थे
जब भी कहीं मिल जाते थे
साहेब, कैसे है आप, कोई काम है तो बताना
ऐसी बातें कर जाते थे
पर अब, में ६० के पार चला गया हूं
और अक्सर, मोहल्ले के बीच में लगी
बेंच पे मिलता हूं
आज भी लोग सुबह शाम सामने से निकलते है
पर नज़रे नहीं मिलाते, नमस्ते बोलने में झिझकते है

मैं भी बस, घरों के रोशनदानों में बनी जालियों को गिनता हूं
और कभी, उनके आस पास मंडराती
चिड़ियाओं को तकता हूं
पर ये भी, नागवार गुजरता है
जब, इन्हीं घरों में रहने वाले बच्चो में से
हां, वो बड़े है, लेकिन मेरे लिए तो बच्चे हैं

जब इन्हीं घरों में रहने वाले बच्चो में से
कोई आकर मुझसे कहता है
बाबूजी, आप क्या दिनभर घर में झांकते रहते है
कुछ शरम करो, बहू बेटियां रहती है यहां
क्यूं ताड़ते रहते हो

कुछ तमन्नाएं, जो कभी रह गई थी अधूरी
पूरी करने की कोशिश भी करी
आजकल, अपने गले की, थोड़ा साफ कर
गाने की जुर्रत करी
पर ये भी, कहा बर्दास्त है जमाने को
क्या भूत चड़ा है बुडे को, जो अब गाने लगा है
बच्चो के साथ बच्चा भी बनने की कोशिश करी
पिछली बार, एक शाम, पब में कटी
आज तक ताने, लोगो के सुनता हूं
साठ के पार है, पर बहुत उछलता है

अब कुछ भी करे, सठिया गए है
का टैग, लग गया हैं
जमाने के साथ चले या अपने जमाने में चले
कुछ नहीं पता है

पर, किसी ने कहा है,
जिंदगी लंबी नहीं बड़ी जीनी चाहिए
इसीलिए, अब नहीं करता परवाह
बूढ़ा होगा तेरा बाप
हमे तो दिल जवान चाहिए

देव

तुझे मिलेगी मंजिल फिर से नई…

लोग क्या कहेंगे
यही सोचती रही वो
अपने से ही, अकेले में बाते
अपनों से ही मुलाकाते
करने को मजबूर है वो,

अभी ही तो उसका साथ छोड़
वो कही चला गया था
उसे, अपने हाल पर अकेले
यही छोड़ गया था
और वो है, कि आगे बढ ही नहीं पाई
जिन्हे अपना कहते है, उन्हीं ने
पावों में, लोग क्या कहेंगे,
की बेडिया लगाई

लोगो का क्या है, कुछ भी
कहते रहते है
उन्हें क्या पता, जो तन्हा होते है
दर्द क्या सहते है
आगे बढ, दो कदम जब तू बढ़ाएगी
एक मांजिल ही तो छूटी है
और मिल जाएगी

वो भी तो अकेला ही है
जिसने तुझे कॉफी पर बुलाया था
लोगो क्या कहेंगे, इसीलिए
हाल ए दिल ना कह पाया था
समझ उसका भी दर्द, तुझसे
कुछ ज्यादा ही होगा
उस पर तो उसके है घरवालों का भी
विश्वास नहीं होगा
आदमी है वो, आसान नहीं उसका जीना भी
इसीलिए कदम तुझको उठाना होगा
मुश्किल नहीं है ये इतना भी

तू बड तो सही, ऐतबार कर तो सही
तुझे मिलेगी मंजिल फिर से नई

देव

ये भी इक इश्क़ था।

ये भी इक इश्क़ था।

पांच बजने का इंतजार करना
नोटबुक के पन्नों को बेसब्री से पलटना
कब खत्म होगी क्लास,
इशारों में दोस्तो को, बताना
चेहरे पे पचास एक्सप्रेशन बनाना
होठों से गालियों का बड़बड़ाना
क्लास खत्म होते ही,
अपने हिस्से का नाश्ता
दोस्त को थमा, अहसान जता
बस स्टॉप की ओर भागना

बस में खाली सीट को हथियाना
और कोई आए तो जताना,
“भाई, ये सीट रिजर्व्ड है, कहीं और बैठ जाओ”
फिर उसके इंतजार में खो जाना
और जब वो आए, खुदा से दुआ मांगना
“ऐ खुदा, आज तो उसे, मेरे बगल में बिठाना”

हां, वो दुआ खुदा ने भी सुनी
और जब वो पहली बार मिली
मेरी बगल कि सीट पर बैठी
मुस्कुरा कर उसको वेलकम किया
जैसे, सीट नहीं, घर हो अपना
होले से हैलो कहा,
उसने भी मुस्कुरा कर रेस्पॉन्स दिया
बस भाई, यह अपनी निकल ली
ये पहली सीढ़ी है जो पार कर ली
अब तो बस बातें शुरू
हर रोज होने लगे रूबरू
इक बात तो तय है
उस भी हमारी सोहबत मंजूर है
तभी तो, जब वो पहले आ जाती थी
बगल की सीट हमारे इंतजार में रोक ली जाती थी

सिलसिला, यू ही चलता रहा
उसके चेहरे का नूर, अच्छा लगने लगा
पर, अब तो बाय कहने का वक़्त पास था
उस भी पता था, की मैं मुसाफिर हूं
उस शहर में कुछ दिनों का मेहमान था
फिर, वहीं रास्ते वहीं तन्हाइयां होंगी
बहुत दूर रहेगी वो, बस यादें होंगी

आज भी, कभी कभी याद आ जाते है वो पल
जैसे, बरसो नहीं, मिला था उससे बस में बस कल
क्या ये हाल सिर्फ मेरा है है
या दुंडती है मुझे अब भी नज़रे उसकी किसी पल

देव

हां वो इश्क़ कहीं खो गया है…

आज की आप धापि
और जमाने के शोर में
जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

लब्जों में गड़ कर, हाल ए दिल
बड़े प्यार से, खत में भेजा करते थे
डाकिए से छीन, पड़ कर चिट्ठी,
यारो की तबियत का,जायजा लिया करते थे

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

बस, निकल आते थे, गलियों में उनकी
कि इक पल को, यार का दीदार हो जाए
कटी बॉल के दायरे में फसा कागज, फेक
शाम, 5 बजे, बगीचे में,
मिलने की जगह तय करते थे

वो उस बेंच पर बैठे, जमाने से नज़रे बचा
इशारों ही इशारों में बांते करती थी
और हम, जब तक वो थी, तकते थे
उसके जाने पर उसकी ही जगह बैठ ,
उसको महसूस किया करते थे

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

बड़ी खुशी हुए, जब अठारह का हुआ
पिताजी की बाइक, पर भी अधिकार हुआ
अब तो, कभी मोहल्ले से दूर, उससे मिलने जाता हूं
बाइक की पिछली सीट पर भी, उस बैठाता, घूमता हूं

बाइक पर भी एक मर्यादा होती थी
बस उसकी एक हथेली मेरे कंधे पर होती थी
बड़े ध्यान से, स्पीड ब्रेकर पार करता था
और गलती से कहीं और स्पर्श हो जाता
तो सॉरी बोलता था

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

तब प्यार सच्चा हुए करता था
इश्क़ में विश्वास हुआ करता था
उसको पाने कि जिद नहीं,
उस खुश देखना चाहता था


मिलने पर राजकुमार उस, खुद ही ने खुद को उसकी नज़रों से गिराया था
दबा ख्वाहिशों और गमो को अपने
उसकी शादी में, बारातियों को खाना खिलाया था
झलकते आंसुओ के सैलाब को रोक आंखो में
हस्ते चेहरे से, उसको विदा कर आया था

पर अब जाने दिलों को कुछ हो गया है
हां वो इश्क़ कहीं खो गया है

मेरी मां थी

Below is a truth… A very small part of struggle of my mom… For us…

जब भी मैं परेशा होता था
हरदम, मेरे बालो में उसका हाथ होता था
जब भी, मेरी तबियत नरम होती थी
वो वहीं आस पास होती थी

ऐसा नहीं, कि वो रहती थी हर वक़्त करीब
हमको दे सके एक सुंदर भविष्य
इसीलिए उसने अपना आराम छोड़ा
जो कभी, पली थी नाजो से
निकल पड़ी, अंगारो भारी रही पे
और अपना घर छोड़ा

आज भी याद है, जो डरती थी जरासी आहट से
सुनसान वीरान , अकेले से मकान में
रात के घनघोर अंधेरों में
एक छोटे से केरोसिन के दिए की रोशनी में
भरी गर्मी में, रात बिताती थी

रेगिस्तान के तपते धोरो के
इस ओर, उस ओर बसी बस्तियों में
तवे सी जलती सबको
और भभकती हवाओं में
पल्लू से चेहरे से को बांधे हुए
छोटी सी बोतल से बीच बीच में
कुछ घूंट पानी के पीते हुए
बच्चो को पोलियो की दवा पिलाने जाती थी
हमे अच्छी जिंदगी मिले
इसीलिए, नाराज से मौसमों में भी
अपना फ़र्ज़ निभाती थी
छह दिन इसी मशक्कत के बाद
इतवार को फिर, बड़े प्यार से
हमे खाना खिलाती, दुलारती थी
हां, वो कोई और नहीं
मेरी मां थी
मेरी मां थी

तू नहीं रहती वहां, पर तकता हूं आज भी…

मेरा आना जाना भी, उसी गली से था
जिस गली में, कभी तेरा घर था

देखा है मैंने कई बार, तुझे बाल सुखाते हुए
उलझी हुई सी जिंदगी को, संवारते हुए

तेरे लबों की मुस्कुराहट ने, कितनो को लुटा है
जाने, कितने दिलों का, दम वहा छूटा है

राहें बदल गई, फिर भी, गुजरता हूं आज भी
तू नहीं रहती वहां, पर तकता हूं आज भी

देव

लेफ्ट- राइट

लेफ्ट पे राइट
राइट पे लेफ्ट
करना सीख गई हूं
तेरे लेफ्ट राइट को ठीक करने में
अपना राइट लेफ्ट भूल गई हूं

वैसे, कार तो मैं भी उम्दा चलाती हूं
पर, बगल की सीट पर, जब तू होता है
हर सिग्नल तोड़ जाती हूं

और तेरे चेहरे की घबराहट पे
हसीं आती है
और पीछे बैठी वो, अपनी आंखो से
हाथ तक नहीं हटाती है

बस दुआ करती है, सही सलामत घर पहुंचा दो मुझे
मैं अपनी बेटी की, इकलौती मां कहलाती हूं

देव