यूं तो अकेली चली थी

जाने क्यूं, वो ठिठक कर रुक सी गई,
रास्ते में, कुछ देर ठहर सी गई,
यूं तो अकेली चली थी,
ना साथ था ना मंजिल,
मगर कुछ देर से, कुछ एहसास था,
जो चले जा रहा था, कुछ कदम पीछे उससे,
मुड़ कर देख लू, थोड़ा ठहर जाऊं,
या बस चलती चली जाऊ,
बड़ा असमंजस था, उसके ख्यालों में,
उलझी सी चल रही थी वो,
कुछ सवालों में, किन्तु हर्ज क्या है,
हर्ज क्या है, गर रुक जाऊं जरा सा,
बड़ा दू हाथ, गर वो लगे कुछ अपना सा,
यूं भी तो, माना निकली अकेली थी,
मगर तन्हा कहां थी, किसी के साथ की,
ख्वाहिशें जवां थी, कब तक, आखिर कब तक,
यूं ही अकेली चलती रहूंगी,
थाम कर हाथ किसी का, आखिर कब मैं थोड़ा बैठूंगी,
बस, इसी ख्यालात ने, उसे झकझोर दिया था,
यूं ही नहीं उसने, ये ठहराव लिया था।।

देव

22/08/2020, 9:58 am

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