जिन्दगी, है तो जिंदा हूं,
वरना मैं, मैं कहा हूं,
धड़कने तो चलती रहती है,
मगर, इनमे मैं कहा हूं।
मेरा वजूद, मेरी शख्शियत का, होना नही है,
मेरा वजूद, इन सांसों का, चलना नहीं है,
मेरा वजूद, जेहन में, औरों के होने में है,
मेरा वजूद, मेरे नाम के,चर्चे में है।
लगता है, हां, मैं जिंदा तो हूं,
किसी के ख्वाब में सही,
तो किसी की धड़कन में हूं,
कोई नफरत से ही सही,
हां, मैं जिंदा हु, मेरी
कविताओं के हर शब्द में,
हां, मैं जिंदा हु, पढ़ने
वाले के हर लब्ज़ में,
हां, मैं जिंदा हु, आस मुस्कान में,
जो अक्सर मेरे लब्जातों से मिली है,
हां, मैं जिंदा हु, हर उस दिल में
मुझे पढ़ जिसमे इश्क की उम्मीद खिली है।
देव 27/02/2021, 11:01 pm –