अरमान बड़े छोटे, मगर हौसले बुलंद थे…

अरमान बड़े छोटे, मगर हौसले बुलंद थे,

कागज की कश्ती ले, बारिश में निकलते थे।

पास कुछ ना होता था, मगर साथ काफी था,

तुतलाती आवाज में, चल ना याल, निकलता था।

स्कूल के अंतराल में, सबके टिफिन निकलते थे,

खाने की होड़, और पार्टी के रोज दौर चलते थे।

उम्मीद, कभी किसी यार से, नहीं की जाती थी,

जो चीज भा गई, हक से अपनी बना ली जाती थी।

वो बचपन था, अब हम बड़े हो गए है,

ये तेरा, ये मेरा में खो गए है,

बहुत कुछ है मगर कंगाल हो गए है।

अब अरमान बड़े, हौसले पस्त हो गए है।

देव

27/02/2021, 12:25 am

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