ये तो तुम मिल गई, वरना,
कहा तलाश में था मैं,
गुम हो, जिन्दगी हो,
फलसफे सुलझा रहा था मैं।
तेरे चेहरे का सुकून ही तो है,
जिसमे खो गया मैं कहीं,
कब से वरना, किस्से
कहानियां बना रहा था मैं।
तारीफ में तेरे, ना जाने,
कितनी नज़्म लिख दी,
और यू ही, बेकार हालातों पर,
शायरियां बना रहा था मैं।
अब तू है, मगर है कहां,
इसी तलाश में, गुम हूं,
मगर होश जितना भी है, बस
तेरा नाम लिए जा रहा हूं मैं।।
देव
27/08/2020, 3:08 pm