कुछ गुजर गया, कुछ गुजरना है,
अभी अक्स को अपने, और सवारना है।
मंजिल की फिक्र, कहां है मुझे,
रास्तों को यादों के झरोखे में उतारना है।
फिक्र कर के भी, क्या मैं पा लूंगा,
जो बस में नहीं, उसे जह़न से उतारना है।
अल्फ़ाज़ है तो है, जो काबिलियत है मेरी,
लब्जो से अपने, कुछ चेहरों को हंसाना है।।
देव
13/09/2020, 5:30 pm