मैं कहां, मैं बन पाता।

मैं, मैं कहां बन पाता,
कच्ची मिट्टी से बना,
अधपका बर्तन रह जाता,
हो सकता है, सूरत अच्छी होती,
मगर कहां, अच्छी सीरत पाता,
गर, तुम ना होते,
मैं कहां, मैं बन पाता।

मैं तो बस चल रहा था,
अनजान मंजिलों से,
अक्सर था लड़खड़ा कर गिर जाता,
राहें बहुत थी और मैं
बेखबर, मुश्किल सफ़र से,
बस चलता ही जाता,
कहां मैं अपनी मंजिल पाता,
गर तुम ना होते,
मैं कहां, मैं बन पाता।

शुक्रिया है मेरे हर उस गुरु को,
जिसने है मुझे मैं बनाया,
कभी चलना, कभी बढ़ना,
अपनी मंजिल और राहें चुनना सिखाया,
मुझे बस मैं नहीं,
हम का पाठ पढ़ाया,
सादर प्रणाम है तुम्हे हे गुरुवर,
तुमने जीवन का सबक सिखाया।।

देव

06/09/2020, 11:41 am

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