हर बार, यूं ही, क्यूं,
वो जख्म लेती है,
अक्सर, अपनों के लिए,
चोटिल वो होती है।
यूं ही बातो बातो में, अक्सर,
कुछ बोल जाते है,
इतने बेसमझ भी नहीं,
के यूं दिल दुखाते है।
अपना समझ कर,
वो हमेशा चुप सी रहती है,
दर्द दिल का, नहीं
किसी को कहती है।
कहे भी किस से,
कोई नहीं यहां अपना,
जिसे समझा अपना,
वही तोड़ चला, कोई सपना।
इसीलिए, अब हरदम
वो महफ़िल में मुस्कुराती है,
खुद से मोहब्बत करती है,
खुद को ही, इश्क जताती है।।
देव
08/09/2020, 9:03 pm