आओ कुछ कर के दिखाएं॥

भरा समंदर मन के अंदर,
नयनों से होता है क्रंदन,
घाव दे गए, दिल के अंदर,
जो रहे थे अपना बनकर।

अस्त सूर्य है, अस्त चांद है,
घनघोर घटा, फैली आज है,
नहीं अमावस की ये रात है,
स्याह हुआ आज आकाश है।

धरती रोए, अम्बर रोए,
उड़ते उड़ते पक्षी रोए,
रोए वृक्ष, जंतु भी रोए,
कैसी रात, ना कोई सोए,

कैसी है दुर्दशा जहां की,
नहीं सुरक्षित, स्त्री यहां की,
चीरहरण होता है हर पल,
इज्जत वाले है अब निर्लज्ज,

आओ कुछ कर के दिखाएं,
खौफ का माहौल हटाए,
इस जहां को, बेखौफ बनाए,
एक सुनहरा, जहां बसाएं।

देव

05/10/2020, 1:14 pm

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