ये शहर अब मुझेअनजान सा लगता है,

ये शहर अब मुझे
अनजान सा लगता है,
लोग तो बहुत हैं मगर
वीरान सा लगता है
रास्ते है पहचानता हूं उन्हें,
है मोड़ पर मंजिल है,
रहते है लोग इनमें
जानता हूं मैं,
हर कोई अब मुझे
अनजान सा लगता है
ये शहर….

कहकहे और ठहाको की आवाज
गूंजती है कानो में
कभी लगती थी महफिल जहां,
सुनसान है बस्ती वहां,
जिन बाजारों में, फिरते थे
लेकर हाथो में हाथ यार का
हर बाजार अब वहां,
वीरान सा लगती है,
ये शहर ..

ख्वाहिशें तो बहुत है,
फिर से मिले, फिर से करें
महफिलों की तैयारी
नज़रे छुपा कर तुमसे,
फिर से देखे
झुकी नज़रे तुम्हारी
बेवजह तुझे फिर से,
उस बारहदरी में ले जाऊं,
थाम हाथ तेरा , बस यूं ही,
चलता चला जाऊ।
ना तू है अब इस शहर में,
अब ये सुनसान सा लगता है,

ये शहर अब मुझे
अनजान सा लगता है,
लोग तो बहुत हैं मगर
वीरान सा लगता है

देव

13/10/2020, 3:39 pm

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