राम और रावण

रावण।।।

अस्त्र शस्त्र की वर्षा थी, हर ओर युद्ध की चर्चा थी,
संहार मचा था, हर दिशा में हाहाकार मचा था,
कहने को तो नाम, राम और रावण था,
एक तरफ सत्य था, उस ओर अहंकार खड़ा था।

महाज्ञानी, महाबलशाली, चारो वेदों का ज्ञाता,
शिव का भक्त, तपस्या का हठ, ज्येष्ठ भ्राता,
ध्वनि प्रचण्ड, बाहें भुजंग, किया शनि को कैद,
जहां इन्द्र शांत, करे साष्टांग, धनवर्शा करे कुबेर।

बस एक ही गलती, बहुत हो गई,
अहम की सीमा पार हो गई,
लेने बदला, एक वनवासी से,
साध्वी की कलाई, आहत हो गई,
भुला ज्ञान अखंड, कर रूप प्रचण्ड,
अगवा कर लाया, सम्मान विश्व का,
स्वयं धरती की पुत्री, बना बंदी उसने,
कर डाला था, तिरस्कार सती का।

भूला था पथ, भूला था पाठ,
ना सुनने को आतुर, कोई ज्ञान की बात,
अर्धांगणी पर, ना रहा विश्वास,
भाई को दिया था, देश निकाल,
समझाइश को जब ज्ञानी आए,
कह वानर उनको, स्वयं महल जलवाए,
अपनी जिद में, अपने खोए,
खोई मती अपनी, अपनी सत्ता खोए।

सम्राट था वो कभी, धरा पर पड़ा था,
मरने को आतुर, राम जप रहा था,
अपनी करनी पर, था पश्चाताप उसको,
मरते मरते, ये ज्ञान दे रहा था।

शक्ति है तो शक्ति है, ना शक्ति का करो अपमान,
गर्व करो, घमंड को छोरो, वरना अंत करे स्वयं अभिमान।।

देव

25/10/2020, 7:40 pm

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