लौट आए वो बचपन!

जाने कहां वो ज़माना चला गया,
के अब खुल के रोने में भी शरमाते है,
जहा, हर गम को, आंसुओ में बहाते थे,
अब, हर रंजिश भी, दिल में बसाते है।

ए काश! फिर से लौट आए वो बचपन,
बेफिक्र हो, ज़माने से, जीता था जब,
ख्वाहिशें कहां, जमा रहती थीं तब,
दो आंसू बहने से, मिल जाता था रब।

देव

27/10/2020, 10:56 am

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