कुछ पल मुझे दे दे, जिन्दगी जी लूगां,
जो छूटा है कहीं, वो बचपन फिर लूगां
अंधेरों से डरना, और अंधेरे में छिपना,
मोहल्ले की लेन में, लुका छिपी खेलना,
वो खाली मकान, कहते थे जिसे भूतिया स्थान,
उसी के आंगन में, लगी इमली का तोड़ना।
चिल्लाना गला फाड़ कर, जब होता संज्ञान,
छोड़ गए यार, चुप चाप, बन अनजान।
वो बारिश का मौसम, वो रिमझिम बरसना,
मोहल्ले की सड़क का, दरिया सा बनना।
काग़ज़ की कश्ती की, लगाना वो दौड़,
हाथो का चप्पू, वो जीतने की होड़।
कुछ पल मुझे दे दे, जिन्दगी जी लूगां
जो छूटा है कहीं, वो बचपन फिर लूगां।
देव
13/11/2020, 12:08 am